5 जनवरी सन 1993 को तोषाम भिवानी (भिवानी) में लाला लहरीमल जैन की धर्मपत्नी श्रीमती गीगीबाई जैन ने एक पुत्र को जन्म दिया। बालक का नाम रखा गया - चन्द्रसैन्। घर के धार्मिक वातावरण और देश की संग्रामी हवाओं की श्वास से विकसित बालक चंद्रसैन का व्यक्तित्व सामाजिकता और उत्तरदायित्व बोध के विशेषणो के साथ निर्मित हुआ।
बाबा श्योनाथ जैन, जिन्होने तोषाम गाँव में धर्मशाला , मंदिर कुआँ और विद्यालय के निर्माण जैसे अविस्मरणीय कार्य किए, उनके गुण बालक चंद्रसैन मे प्रस्फुटित हो रहे थे।
हिन्दी उर्दू और अंग्रेजी भाषा पर आपका विशेष अधिकार था। तेरापंथ समाज के सिरमौर आचार्य महाप्रज्ञ जी का अनुकरण आपकी धार्मिक आस्थाओं का पथ बना। राम और रामकथा आपके जीवन की धुरि रही।
तुलसीदासकृत रामचरितमानस की पाठ भिवानी के कोने-कोने में करने का प्रक्रम आपने लम्बे समय तक निभाया। जीवन यापन की शाश्वत समस्या के समाधान के लिए आप अपने गाँव की धरती से बिछुड़ गए और भिवानी आकर भिवानी टैक्सटाइल मिल में क्लर्क के रुप में कार्य करने लगे। 40 साल की इस नौकरी के दौरान आपके भीतर की सामाजिकता और नेतृत्व क्षमता अनवरत विकसित होती गई।
फैक्ट्री के 5000 मज़दूरों के संघ के निर्विवाद नेता के रुप में आपने प्रबंधन और मज़दूरों के मध्य वार्ता सेतु की भूमिका निभाई। इस दौरान प्रबंधकों ने समय-समय पर पदोन्नति आदि का लालच देकर आपको पथभ्रमित करने का प्रयास किया किन्तु आपको अपने सिद्धांतो से समझौता करना कभी गवारा नहीं रहा।
24 वर्ष की आयु में भिवानी के गांव तिगड़ाना की चमेली देवी के साथ आपने दाम्पत्य जीवन में प्रवेश किया। आपके दो पुत्र मनोज और राजेश आज दिल्ली शहर में सफल जीवन यापन कर रहे हैं। आपकी दो पुत्रियां शशि और आशा अपने भरे-पूरे परिवार में सुखीइ हैं।
पारिवारिक उत्तर दायित्वों के निर्वाह के सथ ही आपकी राजनैतिक सजगता ऐसी थी कि जनसंघ के दीपक में अपनी निष्ठा का घृत डाल आपने भिवानी भर में अपनी विचारधारा का प्रचार किया। भिवानी क्षेत्र में जनसंघ की सभी सभाओं का मंच-संचालन आप ही करते थे। आप स्वयं एक प्रखर वक्ता थे और अपनी वाणी से हज़ारो लोगो के मन - मस्तिष्क को प्रभावित करने में दक्ष थे।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर जब कभी भी प्रतिबंध लगा, आपने और अधिक सक्रियता से कार्यकर इस प्रतिबंध किया। सन 1975 में जब सरकार ने आपातकाल की घोषणा की तब आपने भूमिगत रहकर संघ के कार्य की सक्रियता बनाए रखी। इसी क्रम मे जब रामजन्म भूमि आन्दोलन के दौरान आप गिरफ्तार हुए तो भी आपने अपने विचार के प्रति निष्ठा का परित्याग नहीं किया। आपके क्रांतिकारी विचारों की तस्वीर आपके जीवन के अनेक संस्मरणों में स्पष्ट होती है।
सेवानिवृत्ति के उपरांत जब आप दिल्ली आए तो भी आपने आयु के प्रभाव को धता बताते हुए अपनी सक्रियता बनाए रखी। रोहिणी के जिस माडर्न अपार्टमेंट्स में आपका निवास था, उस सोसायटी के आप अध्यक्ष रहे। पूरी सोसायटी के बच्चे आपको महात्मा गांधी कहकर बुलाते थे।
जीवन के अंतिम पड़ाव में जब देह ने साथ छोड़ना प्रारंभ किया और आप तेरह महिने तक डाइलेसिस की कष्टकारी प्रक्रिया से गुजरते रहे तब भी आपकी दिनचर्या मे निष्क्रियता की संज्ञा नहीं जुड़ पाई। 17 नवम्बर 2012 को हृदयगति रुकने के कारण आपने इस दुनिया से विदा ली।
कहा जा सकता है कि आपके जन्म से सक्रियता और आयु की जो दौड़ प्रारंभ हुई थी, उसमे आयु हार गई और सक्रियता अंतिम क्षण तक पास खड़ी मुस्कुराती रही।
बाबा श्योनाथ जैन, जिन्होने तोषाम गाँव में धर्मशाला , मंदिर कुआँ और विद्यालय के निर्माण जैसे अविस्मरणीय कार्य किए, उनके गुण बालक चंद्रसैन मे प्रस्फुटित हो रहे थे।
हिन्दी उर्दू और अंग्रेजी भाषा पर आपका विशेष अधिकार था। तेरापंथ समाज के सिरमौर आचार्य महाप्रज्ञ जी का अनुकरण आपकी धार्मिक आस्थाओं का पथ बना। राम और रामकथा आपके जीवन की धुरि रही।
तुलसीदासकृत रामचरितमानस की पाठ भिवानी के कोने-कोने में करने का प्रक्रम आपने लम्बे समय तक निभाया। जीवन यापन की शाश्वत समस्या के समाधान के लिए आप अपने गाँव की धरती से बिछुड़ गए और भिवानी आकर भिवानी टैक्सटाइल मिल में क्लर्क के रुप में कार्य करने लगे। 40 साल की इस नौकरी के दौरान आपके भीतर की सामाजिकता और नेतृत्व क्षमता अनवरत विकसित होती गई।
फैक्ट्री के 5000 मज़दूरों के संघ के निर्विवाद नेता के रुप में आपने प्रबंधन और मज़दूरों के मध्य वार्ता सेतु की भूमिका निभाई। इस दौरान प्रबंधकों ने समय-समय पर पदोन्नति आदि का लालच देकर आपको पथभ्रमित करने का प्रयास किया किन्तु आपको अपने सिद्धांतो से समझौता करना कभी गवारा नहीं रहा।
24 वर्ष की आयु में भिवानी के गांव तिगड़ाना की चमेली देवी के साथ आपने दाम्पत्य जीवन में प्रवेश किया। आपके दो पुत्र मनोज और राजेश आज दिल्ली शहर में सफल जीवन यापन कर रहे हैं। आपकी दो पुत्रियां शशि और आशा अपने भरे-पूरे परिवार में सुखीइ हैं।
पारिवारिक उत्तर दायित्वों के निर्वाह के सथ ही आपकी राजनैतिक सजगता ऐसी थी कि जनसंघ के दीपक में अपनी निष्ठा का घृत डाल आपने भिवानी भर में अपनी विचारधारा का प्रचार किया। भिवानी क्षेत्र में जनसंघ की सभी सभाओं का मंच-संचालन आप ही करते थे। आप स्वयं एक प्रखर वक्ता थे और अपनी वाणी से हज़ारो लोगो के मन - मस्तिष्क को प्रभावित करने में दक्ष थे।
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ पर जब कभी भी प्रतिबंध लगा, आपने और अधिक सक्रियता से कार्यकर इस प्रतिबंध किया। सन 1975 में जब सरकार ने आपातकाल की घोषणा की तब आपने भूमिगत रहकर संघ के कार्य की सक्रियता बनाए रखी। इसी क्रम मे जब रामजन्म भूमि आन्दोलन के दौरान आप गिरफ्तार हुए तो भी आपने अपने विचार के प्रति निष्ठा का परित्याग नहीं किया। आपके क्रांतिकारी विचारों की तस्वीर आपके जीवन के अनेक संस्मरणों में स्पष्ट होती है।
सेवानिवृत्ति के उपरांत जब आप दिल्ली आए तो भी आपने आयु के प्रभाव को धता बताते हुए अपनी सक्रियता बनाए रखी। रोहिणी के जिस माडर्न अपार्टमेंट्स में आपका निवास था, उस सोसायटी के आप अध्यक्ष रहे। पूरी सोसायटी के बच्चे आपको महात्मा गांधी कहकर बुलाते थे।
जीवन के अंतिम पड़ाव में जब देह ने साथ छोड़ना प्रारंभ किया और आप तेरह महिने तक डाइलेसिस की कष्टकारी प्रक्रिया से गुजरते रहे तब भी आपकी दिनचर्या मे निष्क्रियता की संज्ञा नहीं जुड़ पाई। 17 नवम्बर 2012 को हृदयगति रुकने के कारण आपने इस दुनिया से विदा ली।
कहा जा सकता है कि आपके जन्म से सक्रियता और आयु की जो दौड़ प्रारंभ हुई थी, उसमे आयु हार गई और सक्रियता अंतिम क्षण तक पास खड़ी मुस्कुराती रही।
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