भाई राजेश जी, मैं जानता हूँ कि जीवन में कभी कभी ऐसी स्थितियाँ आ जाती है , जब शब्द मौन हो जाते है और भावनायें आकाश हीन ! एहसास बाहर आने के स्थान पर मन के किसी कोने में चुप्पी साध कर बैठना चाहते है ! बाबू जी का दुनिया से जाना एक ऐसा ही क्षण है ! मुझे लगता है की हमें उनके ' विजन ' और इश्दृष्टि से प्रेरणा लेना उनमे विचारों को आगे बढ़ाना चाहिये ! वो अपनी जो वंश बेल छोड़ गये है , उसमें इतनी शक्ति सौप कर गये है की इस कार्य को कर सकती है ! यही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी ! - डा . प्रवीण शुक्ल ( हास्य - व्यंग्य कवि )
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